Monday, 20 November 2023

हाँ , हूँ मैं एक नारी

 हाँ , हूँ  मैं एक नारी

पर क्या यह भी है गलती हमारी?

स्त्री के रूप में जन्म लिया

अपना हर एक कर्म किया।

फिर भी हे समाज तुम्हें शिकायत है क्या?

मुझमें ही ऐसी कमी है क्या?


जननी के रूप में तुम्हारा पालन पोषण किया

ममता से तुम्हारा आंगन भर दिया।

बेटी के रूप में घर में रौनक ले आई

बहन बनके तुम्हारी हर गलती छुपाई।

पत्नी के रूप में जीवनसाथी बन आई 

और न जाने कितनी भूमिकाएं हर दिन हसी खुशी है निभाई।

अपने हर धर्म को सच्ची निष्ठा से निभाया

पर फिर भी पता नहीं हे समाज तुम्हें मुझसे शिक़ायत है क्या?

मुझमें ही ऐसी कमी है क्या?


"ये मत पहनो, वो मत करो"

अपने इन शब्दों से तुमने मुझे बांध रखा है

इन बेड़ियों के चंगुल में मेरा दम घुट रहा है।

ऐसा कुछ नही है जो मैं न कर सकती हूँ 

बस तुम्हारे प्रोत्साहन की उम्मीद तो कर सकती हूँ ?


घर हो या दफ्तर, इंजीनियर बनू या शिक्षक

मैं जो चाहूं वो कर सकती हूं

अपने सपनो की उड़ान मैं खुद भर सकती हूं।

इस हक़ और सम्मान की लड़ाई मैं लड़ती रहूंगी

और देखना अंत में जीत हासिल मैं ही करुँगी ।

हाँ , हूँ मैं एक नारी

पर क्या यह भी है गलती हमारी?

~ स्नेहा गुप्ता
















Sunday, 19 November 2023

माना कि तुम बड़े हो रहे हो..


 माना कि तुम बड़े हो रहे हो।

पर किसने कहा तुम बचपन खो रहे हो?

हाॅं , स्कूल से निकल गए

पर अभी भी तो कॉलेज/ ऑफिस के बाद 

घर जाने की राह तो देखते हो।

गेम्स पीरियड मिलें न मिले 

जिंदगी के खेल तुम सब बखूबी खेल रहे हो।।


माना कि तुम बड़े हो रहे हो

पर किसने कहा तुम बचपन खो रहे हो?

वो रूठना मनाना आज भी तो चलता है।

दिल के दरवाजे फिर खोल के तो देखो

आज भी दोस्ती का ठिकाना अपना सा लगता है।

बचपन में समय ही समय था 

और आज अपने लिए भी दो वक्त नहीं है ।

किस दौड़ में भाग रहे हो

जहा अपनी जीत में भी

सौभाग्य प्राप्त नही है।।


माना कि तुम बड़े हो रहे हो 

पर क्यों ये बचपन खो रहे हो?

इस उम्र की सीमा का कोई लक्ष्य नहीं है 

जो आज तुम्हारा है वो कल नही है ।

इस जीवन तराजू़ का कोई पक्ष नहीं है

बचपन को तोलकर देखो 

इससे अनमोल कोई नही है।।


अपने अंदर के बच्चे को

हमेशा संभालकर रखो।

दिल तो बच्चा है जी 

खुद को ये बताकर रखो ।

फिर देखो ये जीवन कैसे हसीन लगता है 

बचपन का दौर सबसे रंगीन लगता है।।

माना कि तुम बड़े हो रहे हो

पर किसने कहा तुम बचपन खो रहे हो?

                

                                           ~स्नेहा गुप्ता 






























सिर्फ तुम

तुम कागज़ पर लिखा हुआ वो शब्द नहीं  जिसे स्याही से लिखकर मैं मिटा भी  सकूँ तुम बाज़ारी स लिया हुआ वो क़र्ज़ नही  जिसे सब बेचकर मैं चुका भी सकूँ ...