हाँ , हूँ मैं एक नारी
पर क्या यह भी है गलती हमारी?
स्त्री के रूप में जन्म लिया
अपना हर एक कर्म किया।
फिर भी हे समाज तुम्हें शिकायत है क्या?
मुझमें ही ऐसी कमी है क्या?
जननी के रूप में तुम्हारा पालन पोषण किया
ममता से तुम्हारा आंगन भर दिया।
बेटी के रूप में घर में रौनक ले आई
बहन बनके तुम्हारी हर गलती छुपाई।
पत्नी के रूप में जीवनसाथी बन आई
और न जाने कितनी भूमिकाएं हर दिन हसी खुशी है निभाई।
अपने हर धर्म को सच्ची निष्ठा से निभाया
पर फिर भी पता नहीं हे समाज तुम्हें मुझसे शिक़ायत है क्या?
मुझमें ही ऐसी कमी है क्या?
"ये मत पहनो, वो मत करो"
अपने इन शब्दों से तुमने मुझे बांध रखा है
इन बेड़ियों के चंगुल में मेरा दम घुट रहा है।
ऐसा कुछ नही है जो मैं न कर सकती हूँ
बस तुम्हारे प्रोत्साहन की उम्मीद तो कर सकती हूँ ?
घर हो या दफ्तर, इंजीनियर बनू या शिक्षक
मैं जो चाहूं वो कर सकती हूं
अपने सपनो की उड़ान मैं खुद भर सकती हूं।
इस हक़ और सम्मान की लड़ाई मैं लड़ती रहूंगी
और देखना अंत में जीत हासिल मैं ही करुँगी ।
हाँ , हूँ मैं एक नारी
पर क्या यह भी है गलती हमारी?
~ स्नेहा गुप्ता